अमेरिका ने ईरानी तेल पर लगी पाबंदियों में अस्थायी ढील देने का फैसला किया है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है। इस कदम से जिन देशों को सबसे अधिक फायदा होने की संभावना है, उनमें India भी प्रमुख रूप से शामिल है। दरअसल, Iran के साथ तनाव और संघर्ष के बाद तेल सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है, जिसे कम करने के लिए अमेरिका ने समुद्र में पहले से मौजूद ईरानी तेल कार्गो को बाजार तक पहुंचने की अनुमति देने पर विचार किया है।
अमेरिकी वित्त मंत्री Scott Bessent ने एक इंटरव्यू में संकेत दिया था कि ट्रंप प्रशासन इस दिशा में कदम उठा सकता है। उनके अनुसार, समुद्र में लगभग 14 करोड़ बैरल ईरानी तेल मौजूद है, जिसे अगर बाजार में आने दिया जाता है तो वैश्विक सप्लाई में राहत मिल सकती है। इससे तेल की कीमतों को नियंत्रित करने और शिपिंग बाधाओं के असर को कम करने में मदद मिलेगी, भले ही यह राहत सीमित समय (करीब 10-14 दिन) के लिए ही क्यों न हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत, जो अपनी लगभग 90% तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, इस फैसले से बड़ा लाभ उठा सकता है। भारत पहले भी सस्ते ईरानी तेल का प्रमुख खरीदार रहा है। 2018 से पहले, भारत के कुल तेल आयात में ईरान की हिस्सेदारी करीब 11.5% तक पहुंच गई थी।
इस ढील का एक और अहम पहलू यह है कि अब तक जो ईरानी तेल मुख्य रूप से China को जा रहा था, वह अब अन्य एशियाई देशों जैसे भारत, जापान और मलेशिया की ओर भी रुख कर सकता है। इससे चीन को बाजार दरों पर तेल खरीदना पड़ सकता है, जबकि भारत को अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प मिल सकता है।
भारत का 60% से अधिक कच्चा तेल आयात खाड़ी देशों—इराक, सऊदी अरब, कुवैत और यूएई—से आता है, जिनमें से बड़ा हिस्सा Strait of Hormuz के रास्ते गुजरता है। मौजूदा हालात में इस मार्ग पर दबाव बढ़ा है, ऐसे में ईरानी तेल की उपलब्धता भारत के लिए राहत और अवसर दोनों साबित हो सकती है।

