संवाददाता, धीरेन्द्र कुमार शर्मा की रिपोर्ट, झारखण्ड |
झारखंड में बढ़ता मानव–हाथी संघर्ष अब एक गंभीर मानवीय और प्रशासनिक संकट का रूप ले चुका है। केवल जनवरी 2026 में ही हाथियों के हमलों में कम से कम नौ लोगों की मृत्यु हो चुकी है। इस भयावह स्थिति को देखते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के समक्ष एक कड़ी शिकायत प्रस्तुत की गई है।
अधिवक्ता सत्य प्रकाश, झारखंड एसोसिएशन दिल्ली के संरक्षक (Patron-in-Chief), ने माननीय केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री को एक अत्यंत आवश्यक एवं तात्कालिक हस्तक्षेप हेतु प्रतिनिधित्व सौंपा है, जिसमें मानव जीवन की रक्षा के लिए जवाबदेही तय करने और ठोस सुधारात्मक कदम उठाने की मांग की गई है।
शिकायत के साथ संलग्न समाचार पत्रों की रिपोर्टों के अनुसार, झारखंड में लगातार मानव और हाथियों के बीच घातक टकराव की घटनाएं सामने आ रही हैं, जो ज़मीनी स्तर पर रोकथाम एवं नियंत्रण तंत्र की पूर्ण विफलता को उजागर करती हैं। मंत्रालय द्वारा स्वयं आरटीआई आवेदन के उत्तर में उपलब्ध कराए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 से अब तक देश भर में मानव–हाथी संघर्ष में 462 लोगों की मृत्यु हो चुकी है, जिनमें से वर्ष 2024 से पूर्व के अंतिम वित्तीय वर्ष में अकेले झारखंड में 133 मौतें दर्ज की गईं।
इस स्थिति को “पूरी तरह मानव-निर्मित और रोकी जा सकने योग्य” बताते हुए प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि हाथी गलियारों पर अवैध कब्ज़ा, आवासीय विखंडन, अनियंत्रित खनन, अवैध अफीम की खेती और अविवेकपूर्ण विकास गतिविधियों ने हाथियों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया है, जिससे वे मानव बस्तियों में प्रवेश करने को विवश हो रहे हैं।
हजारीबाग और चतरा जिले सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों के रूप में उभरे हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि वन एवं जिला प्रशासन द्वारा जंगल क्षेत्रों में हो रही अवैध गतिविधियों को रोकने में गंभीर लापरवाही बरती गई है। विशेष रूप से चौपारण प्रखंड में 50 एकड़ से अधिक क्षेत्र में अवैध अफीम की खेती पाए जाने का उल्लेख किया गया है, जिससे हाथियों की खाद्य श्रृंखला और प्राकृतिक व्यवहार पर गहरा प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
शिकायत में कहा गया है कि, “नशीली फसलों के संपर्क में आना, जंगलों का विनाश और खनन व नशा माफियाओं का अतिक्रमण, हाथियों को गांवों की ओर आने के लिए मजबूर कर रहा है, जिससे जानलेवा हमले हो रहे हैं।”
अधिवक्ता सत्य प्रकाश ने इस संकट को संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार का सीधा उल्लंघन बताते हुए कहा कि मानव जीवन की रक्षा और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में राज्य की विफलता, संस्थागत उदासीनता और वैधानिक कर्तव्यों की घोर उपेक्षा को दर्शाती है।
प्रतिनिधित्व में केंद्रीय मंत्रालय से निम्नलिखित मांगें की गई हैं:
- प्रभावित जिलों में प्रशासनिक विफलताओं की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए
- सभी हाथी गलियारों की पहचान, सुरक्षा एवं पुनर्स्थापन प्राथमिकता के आधार पर किया जाए
- जंगल क्षेत्रों में अवैध खनन, अतिक्रमण और अफीम की खेती के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो
- संघर्ष-नियंत्रण तंत्र को सुदृढ़ किया जाए, जिसमें ट्रैकिंग सिस्टम और त्वरित प्रतिक्रिया दल शामिल हों
- प्रत्येक मृतक के परिजनों को ₹10 लाख का मुआवजा सुनिश्चित किया जाए
- दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करते हुए समयबद्ध राष्ट्रीय कार्ययोजना लागू की जाए
शिकायत में चेतावनी दी गई है कि यदि शीघ्र सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट एक अपरिवर्तनीय मानवीय और पर्यावरणीय आपदा में बदल सकता है।
यह मामला अब राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहा है और उम्मीद की जा रही है कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय मानव जीवन और वन्यजीवों की रक्षा के लिए निर्णायक कदम उठाएगा तथा देश के सबसे अधिक संघर्षग्रस्त वन क्षेत्रों में जवाबदेही बहाल करेगा।

